राज़ की बातें करो!

शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो,

बे-ख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो|

              फ़िराक़ गोरखपुरी

Leave a comment