आज एक बार फिर मैं हिन्दी वरिष्ठ गीतकार और संपादक श्री बालस्वरूप राही जी का गीत शेयर कर रहा हूँ|
राही जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत –

इन पथरीले वीरान पहाडों पर
ज़िन्दगी थक गई है चढ़ते-चढ़ते ।
क्या इस यात्रा का कोई अंत नहीं
हम गिर जाएँगे थक कर यहीं कहीं
कोई सहयात्री साथ न आएगा
क्या जीवन-भर कुछ हाथ न आएगा
क्या कभी किसी मंज़िल तक पहुँचेंगे
या बिछ जाएँगे पथ गढ़ते-गढ़ते।
धुँधुआती हुई दिशाएँ : अंगारे
ये खण्डित दर्पण : टूटे इकतारे
कहते- इस पथ में हम ही नहीं नए
हमसे आगे भी कितने लोग गए
पगचिह्न यहाँ ये किसके अंकित हैं
हम हार गए इनको पढ़ते-पढ़ते ।
हमसे किसने कह दिया कि चोटी पर
है एक रोशनी का रंगीन नगर
क्या सच निकलेगा, उसका यही कथन
या निगल जाएगी हमको सिर्फ़ थकन
देखें सम्मुख घाटी है या कि शिखर
आ गए मोड़ पर हम बढ़ते-बढ़ते ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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