आज एक बार मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

ढाल रही ख़ुद को
बल्लू की भाषा में दादी ।
खल में कूट-कूट शब्दों को
चिपटा कर देती
अपने गालों में बल्लू की
साँसें भर लेती
देख रही पीछे, बचपन की
आशा में दादी ।
अपना क ख मिटा-मिटाकर
ए बी सी लिखती
अनजाने फल-फूलों का
अनुमानित रस चखती
नील कुसुम-सी फबती
घोर निराशा में दादी ।
गौरैया-सी पंख फुलाकर
नाच रही घर में
जैसा सुनती, वैसा गाती
बल्लू के स्वर में
गंगाजली डुबोती
नदी विपाशा में दादी ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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