क्या भाया!

आज एक बार मैं अपने समय के श्रेष्ठ कवि, संपादक और नाटक लेखक स्वर्गीय नेमिचन्द्र जैन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| आप अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के भी एक महत्वपूर्ण कवि थे|

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नेमिचन्द्र जैन जी की यह कविता –

क्या भाया ?

अनजाने मन क्यों इस कोलाहल में खिंच कर बह आया ?

वे वन की संध्याएँ निर्जन

मदिर-अरुण पीली

भोली-सी नीली

सूना निर्झर-तीर,

कहीं से मौलसिरी का परिमल उन्मन

लाया सिहराता समीर–

भर लाया ।

नन्हीं चिड़ियों का कलरव सुन

पूछ-पूछ उठता था तब मन

क्या गाया–

भोली चिड़ियों ने क्या गाया ?

ये उलझे आवरण यहाँ के

बन्धन की काया

झूठी जीवन की परिभाषा

रीते-से आडम्बर की ओछी-सी अभिलाषा–

इस कोलाहल के अंचल में आ कर क्या पाया ?

क्या पाया?

क्यों मन खिंच कर बह आया ?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                                       ********  

4 responses to “क्या भाया!”

  1. बेहतरीन

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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