ट्रेन की पटरियाँ

आज एक बार मैं  हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और वरिष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

सोम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत –

ट्रेन की पटरियाँ
कह रही है कथा
एक आवारगी से जुड़ी शाम की

हाँफते से हिरन का
कभी चौंकना
गूँजती सीटियों की उठी ट्रेन से बैठना
गिटिट्यों के बिखरते हुए
ढेर पर
चक्रवातों – घिरा मन
हुआ है हवा
कौन ले साँस आराम की

सिगनलों के हरे – लाल रंगों -जड़ी
दृष्टि का लौटना
खुदकशी की अंधेरी गुफा में रुकी
सृष्टि का लौटना
गीत संजीवनी दे गया है किसी
एक महके नाम की

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                                  ********  

3 responses to “ट्रेन की पटरियाँ”

  1. बहुत खूब

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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