आज एक बार मैं वरिष्ठ हिन्दी कवि और ग़ज़ल लेखक श्री सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| गुप्त जी की कुछ ग़ज़लें वास्तव में बहुत खूबसूरत हैं|
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सूर्यभानु गुप्त जी की यह ग़ज़ल –

क़ैद इतने बरस रहा है ख़ून
छूटने को तरस रहा है ख़ून
गाँव में एक भी नहीं ओझा
और लोगों को डस रहा है ख़ून
सौ दुखों का सितार हर चेहरा
तार पर तार कस रहा है ख़ून
छतरियाँ तान लें जो पानी हो
आसमाँ से बरस रहा है ख़ून
प्यास से मर रही है ये दुनिया
और पीने को, बस, रहा है ख़ून
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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