चाँदनी रातें बहार!

चाँदनी रातें बहार अपनी दिखाती हैं तो क्या,

बे तिरे मुझ को तो लुत्फ़ ऐ मह-लक़ा* मिलता नहीं|

*खूबसूरती

अकबर इलाहाबादी

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