आज मैं हिन्दी के एक विख्यात नवगीतकार श्री रवींद्र भ्रमर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|
भ्रमर जी की अधिक रचनाएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रवींद्र भ्रमर जी का यह गीत –

पँछी में गाने का गुन है
दो तिनके चुनकर
वह तृप्त जहाँ होता है
गीतों की कड़ियाँ
बोता है !
सूखा पेड़
कँटीली टहनी
बियाबान, सुनसान —
उसे नहीं खलते हैं
उसके तन में
चुभी हुई है
कोई वंशी,
उसके रोम-रोम में
सुरवाले, मीठे सपने पलते हैं ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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