आज एक बार फिर मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत –

मेरे मन की साध आंख में झांक आंक लो
कह देने पर बात बिरानी हो जाती है
सो जाये चुपचाप लहर दृग मूंद रेत पर
मृदु नीरवता बिख़र उठे जब खेत खेत पर
चांद छिपाये काली-घुंघराली अलकों में
तुम आना-जैसे सपने आते हैं पलकों में
मत खनकाना चूड़ी तुम पायल न बजाना
खुल जाने पर प्रीत कहानी हो जाती है।
फड़केगी जब आंख, धीरता चुक जायेगी
चंदा पर जब कोई बदली झुक आयेगी
लजा रहे हों हंस, कमलिनी शरमाई हो-
मैं खुद लूंगा समझ सुनयने, तुम आई हो।
तुम शशि-मुख से घूंघट तनिक उठा देती हो,
लहरों की बेताब जवानी हो जाती है।
तुम आती हो पास हास-उल्लास सँजोये
प्रबल प्यास से अपने आकुल आधार भिगोये
ढल जाती है रात बात पर कब हो पाती
मैं रह जाता खोया-खोया, तुम शरमाती।
कैसा जादू प्राण, न जाने तुम कर देतीं
खुद अपनी ही सांस अजानी हो जाती है
मेरे मन की साध आंख में झांक आंक लो
कह देने पर बात बिरानी हो जाती है।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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