पथरा गईं आँखें!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

उत्खनन में जब मिले अवशेष
वर्जना-दंशित समर्पण के
देखकर पथरा गईं आँखें ।

कमल-दल की बंद मुट्ठी खोल
‘स्वस्ति’ तक लिख सो गए खगपंख
जग उठे ज्यों शापनिद्रा-मुक्त
कल्पतरु वनदेवता के अंक

थरथराते होठ के संदेश
यों जड़े थे साथ दर्पण के
देखकर पथरा गईं आँखें ।

चंद्रमुख पर रचे हल्दी-लेप
धो, हुई पीली समय की धार
सम्पुटित दृग में मिले हिमदग्ध
मदन के शर, उमा का शृंगार

बन गये थे नखक्षत विधुलेख
गीत सारे निशा-वंदन के
देखकर पथरा गईं आँखें ।

उड़ गया कुछ देर सहकर धूप
स्थिर शिखा-सी मानिनी का रंग
चल सका बिछलन भरे इस पंथ
कौन ब्रज से द्वारका तक संग ?

राधिका को टेरते अनिमेष
दो नयन शरविद्ध मोहन के
देखकर पथरा गईं आँखें ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                                  ********  

2 responses to “पथरा गईं आँखें!”

  1. नमस्कार 🙏

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    1. नमस्कार जी

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