आज एक बार फिर मैं हिन्दी की श्रेष्ठ नवगीतकार सुश्री शांति सुमन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
सुश्री शांति सुमन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री शांति सुमन जी का यह नवगीत –

चिट्ठी की पांती से खुलने लगे हैं दिन,
सर्दियाँ होने लगी हैं और कुछ कमसिन ।
दोहे जैसी सुबहें
रुबाई लिखी दुपहरी,
हवा खिली टहनी-सी
खिड़की के कंधे ठहरी,
चमक पुतलियों में फिर भरने लगे हैं दिन,
नीले कुहासे टंके हुए आंचल पर पिन ।
कत्थई गेंदे की
खुशबू से भींगी रातें,
हल्का मादल जैसे
लगी सपन को पांखें,
ऋतु को फिर गुनगुने करने लगे हैं दिन,
उजाले छौने जैसे रखते पाँव गिन-गिन ।
सूत से लपेट धूप को
सहेजकर जेबों में,
मछली बिछिया बजती
पोखर के पाजेबों में,
हाथ में हल्दी-सगुन करने लगे हैं दिन,
सांझ जलती आरती-सी हुई तेरे बिन ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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