आज एक बार फिर मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रतिष्ठित कवि और मंच संचालक श्री शिव ओम अंबर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|
श्री अंबर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शिव ओम अंबर जी की यह ग़ज़ल –

कि अगले ही कदम पे खाइयाँ हैं,
बहुत अभिशप्त ये ऊँचाइयाँ हैं।
यहाँ से है शुरू सीमा नगर की,
यहाँ से हमसफर तनहाइयाँ हैं।
हुई किलकारियाँ जबसे सयानी,
बहुत सहमी हुई अँगनाइयाँ हैं।
हमारी हर बिवाई एक साखी,
बदन की झुर्रियाँ चौपाइयाँ हैं।
नियति में आपकी विषपान होगा,
जुबां पे आपकी सच्चाइयाँ हैं।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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