आज एक बार फिर मैं एक श्रेष्ठ कवि और नवगीतकार तथा मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

जीवन’
उखड़ा-सा नाखून
समय की
चोट लगी उंगली का।
हर पीड़ा की
फाँस लगी
मन में
इतनी गहरी
जिसे
निकाल न पाए
अनगिन
खुशियों के प्रहरी
हर सपना
निष्फल निकला
ज्यों छिलका मूँगफली का।
चौराहों पर
बिक जाती हैं
पतिव्रता साँसें
फिर भी
तृप्त नहीं हो पातीं
इस मन की प्यासें
मन सुनता रहता है
सबकी,
जैसे मोड़ गली का।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply