अधूरी समाप्तियाँ!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रसिद्ध गीतकार एवं संपादक श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

श्री राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत-

सब समाप्त हो जाने के पश्चात भी
कुछ ऐसा है
जो कि अनहुआ रह जाता है

चलते-चलते राह कहीं चुक जाती है
लेकिन लक्ष्य नहीं मिलता
चाहे रखो उसे जल में या धूप में
किन्तु फूल कोई दो बार नहीं खिलता

खिले फूल के झर जाने के बाद भी
शापग्रस्त सौरभ उसका
किसी डाल के आसपास मंडराता है

अच्छा, मैंने मान लिया
अब तुमसे कुछ संबंध नहीं
पर विवेक का लग पाता मन पर सदैव प्रतिबंध नहीं

अक्सर ऐसा होता है
सब ज़ंजीरें खुल जाने के बाद भी
क़ैदी अपने को क़ैदी ही पाता है

मृत्यु किसी जीवन का अंतिम अंत नहीं
साथ देह के प्राण नहीं मर पाते हैं
दृष्टि रहे न रहे कुछ फ़र्क नही पडता
चक्षुहीन को भी तो सपने आते हैं

सभी राख हो जाने के पश्चात भी
कोई अंगारा ऐसा बच जाता है
जो भीतर-भीतर रह-रह धुँधुआता है
सब समाप्त हो जाने के पश्चात भी….

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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One response to “अधूरी समाप्तियाँ!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    🩶

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