आज एक बार फिर मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| गिरिजा जी को अनेक साहित्यिक सम्मान प्राप्त हुए थे तथा उनको अज्ञेय जी ने प्रतिष्ठित संकलन ‘तारसप्तक’ में भी सम्मिलित किया था|
स्वर्गीय माथुर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की यह कविता-

ओ सनातन काल
बूँद बनकर वह गए जिसमें अनंत त्रिकाल
ओ अमापी काल
डोर में जिसके बँधा है
यह खमंडल व्याल
द्वीपों-विश्वों की अवान्तर दूरियों के भान
सृष्टि के अस्तित्व की
संज्ञा-विगत पहिचान
वर्ण से अनबिंधा
धावित अंतराल अपार
वेग की अंतिम शिराओं के
परस से पार
एक ही घटना
विभाजित किंतु है अनुभूति
शेष होकर भी
युगों के बाद उदित प्रतीति,
कालक्रम की शृंखला में
सत्य का अटकाव
कार्य का
कारण गए के बाद आविर्भाव
साथ सब अस्तित्व
पर कितना विपर्य विधान
वर्तमान, भविष्य गत के
भिन्न सब प्रतिमान
भिन्न सब अनुभव
विभावन के सभी आधार
एक ही संकेत के
कितने विलग झंकार
सत्य सारे समानान्तर
वस्तुएँ, विन्यास
अर्थ सब संदर्भगत
-अप्रमाण हर विश्वास
निमिष-पल की यवनिकाएँ
हैं पड़ीं अविराम
खुल न पाते
सृष्टियों के यह अपूर्ण विराम
दूर की अनुभूतियों का
स्वप्न-सा आभास
पास है कोई अचीन्हा
भिन्न सा अनुप्रास
व्यंजनाओं की प्रतिध्वनि सा
यही विश्वास
बाँधता हमको
विराट प्रतीतियों के साथ
वस्तुओं को अर्थ देता
वह महत् अभिप्राय
काल भी जिस प्रक्रिया का
क्षुद्र सा पर्याय
लय विलय के बीच वह
रूपांतरण की ताल
ओ सनातन काल
बूँद बनकर बह गए जिसमें अनन्त त्रिकाल।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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