आज एक बार फिर मैं अनेक सम्मान एवं पुरस्कारों से अलंकृत, अपने समय के प्रतिष्ठित कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
स्वर्गीय अग्रवाल जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता-

ज़िंदगी को पकड़ूँ
या अपनी समझ को
क्योंकि दोनों के बीच
मैंने जो रिश्ता
खींच-खींचकर बैठाया था
वह अब टूट रहा है ।
और उसकी पीठ पर टिका जो चैन था
वह बीच सड़क पर बिखर गया है
साइकिल के पीछे बँधे आटे की कनस्तर की तरह
और मैं सोच रहा हूँ कि
साइकिल छोड़कर बिखरा आटा समेटूँ या
— पर मारो गोली
साइकिल तो रूपक है
बात तो चैन की है जो बिखर गया है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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