आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी तरह की अलग रचनाएं एक अनूठे अंदाज़ में प्रस्तुत करने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं-

आब ओ दाना रहे, रहे न रहे, ये ज़माना रहे, रहे न रहे
तेरी महफ़िल रहे सलामत यार, आना-जाना रहे, न रहे|
रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की यह ग़ज़ल –
पधारी चाँदनी है तुम कहाँ हो
तुम्हारी यामिनी है, तुम कहाँ हो
समस्यायें उलझती जा रही हैं
नियति उन्मादिनी है, तुम कहाँ हो
अमृत के आचमन का अर्थ ही क्या
तृषा वैरागिनी है तुम कहाँ हो
तिरोहित हो रहा गतिरोध का तम
प्रगति अनुगामिनी है, तुम कहाँ हो
तुम्हारे ‘रंग’ की यह रूप-रेखा
बड़ी हतभागिनी है, तुम कहाँ हो
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to samaysakshi Cancel reply