आज मैं हिन्दी गीत लेखन और मंचों पर उनकी प्रस्तुति के मामले में अपना अनूठा अंदाज़ रखने वाले स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
सरोज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का यह नवगीत –

मुझमें क्या आकर्षण जो तुम अपनी गली
छोड़कर आओ
मेरे पास नहीं अपना घर
फिरता रहता हूँ आवारा
और एक तुम हो कि गाँव में
सब से ऊँचा महल तुम्हारा
कैसे दूँ आदेश उमर को, उनसे ज़रा
होड़कर आओ
लिखा नहीं पाया क़िस्मत में
तुम जैसी सम्पन्न जवानी
तुमने तृप्ति ग़ुलाम बना ली
मेरी प्यास माँगती पानी
तुम्हें ज़रूरत नहीं कि, जो तुम अपने नियम
तोड़कर आओ
भार मुझे ही अपना जीवन
तुम ही ठेकेदार चमन के
तुमने साख भुनाली अपना
जुड़े न मुझसे दाम कफ़न के
मंदिर में अब ऐसा क्या है जो तुम हाथ
जोड़कर आओ
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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