आज मैं मेरे अग्रज और गुरुतुल्य रहे हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

माँसाहारी जग-होटल में
शाकाहारी मन
कैसे करे गुजारा?
होटल-
जिसमें एक-दूसरे को
मानव खा जाता
सुरा समझकर
जिसमें शोणित नर का,
नर पी जाता
“बैरा-झूठ”, घृणा-बावर्चिन”
फेंक रहे हर दिन
कोई गलत इशारा।
होटल-
जिसके दरवाजे हैं
बड़े सजे-संवरे
लेकिन हैं
अश्लील जहाँ के
नाजा़यज कमरे
रखे जगत के वेश्यालय में
कब तक साँस-दुल्हन
आँचल पर ध्रुवतारा?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to christinenovalarue Cancel reply