आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ|
उनको अपनी रचनाओं के लिए सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य वाचस्पति सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की यह कविता –

गा रे गा हरवाहे दिल चाहे वही तान
खेतों में पका धान
मंजरियों में फैला आमों का गन्ध-ध्यान
आज बने हैं कल के ज्यों निशान,
फूलों में फलने के हैं प्रमाण !
खेतिहर लड़की की भोली-सी आँखों में, निम्बुओं की फाँकों में
मुस्काता अज्ञान, हंसता है सब जहान,
खेतों में पका धान !
मधुऋतु रानी महान्,
मानिनी, बसन्ती रंग चोली झलके जिसकी,
ढलके आँचल धानी लहरा-सा,
आँखों में आकर्षण भी ख़ासा,
युग-युग का प्यासा-सा छलके दिलासा जहाँ,
उतरी उन सरसों के खेतों पर मायाविनि ।
हल्के-हल्के-हल्के।
फूल में छिपे निशान हैं फल के ।
उतरी वासन्तिका,
तहलका-सा छाया तरु-दुनिया में, छुटा भान,
स्वागत में कोकिला का पिंडुकी का जुटा गान ।
‘आशा ही आशा है’
आज अनिर्बन्ध, उष्ण, अरुण प्रेम-परिभाषा
पल्लव की पल्लव से सुरभिमय यही भाषा —
‘आशा ही आशा है…’
वासन्ती की दिगन्त-रिनिनिनमयि शिंजनियाँ,
पड़ती जो भनक कान,
परिवर्तित लक्ष-लक्ष श्रुतियों में रोम-रोम,
पंखिल हैं पंचप्राण !
गा रे गा हरवाहे, छेड़ मन चाहे राग
खेतों में मचा फाग ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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