आज फिल्मी गीत और पटकथा लेखक श्री मनोज मुंतशिर के बहाने कुछ बात करने का मन हो रहा है| पिछले दिनों फिल्म ‘आदिपुरुष’ की पटकथा में आए कुछ संवादों के कारण मुंतशिर की काफी बदनामी हुई थी|

पिछले एक-दो वर्षों में श्री मुंतशिर ने काफी ख्याति अर्जित की है, इसकी शुरुआत हुई थी फिल्म ‘केसरी’ के लिए लिखे गए उनके गीत- ‘तेरी मिट्टी में मिल जावां’ से | फिल्मी दुनिया है ही ऐसी कि मिनटों में किसी इंसान को आसमान पर चढ़ा सकती है और मिनटों में नीचे भी गिरा सकती है| पिछले एक-दो वर्षों में श्री मुंतशिर नई ऊंचाइयों को छूते गए, बहुत से लोकप्रिय टीवी कार्यक्रमों में वे प्रस्तुतकर्ता और कहीं विशिष्ट अतिथि बनकर आते रहे| किसी कवि-लेखक को इस प्रकार ख्याति मिलते देखकर मुझे तो बहुत अच्छा लगता है, मैंने श्री कुमार विश्वास को भी इस प्रकार नई बुलंदियाँ छूते हुए निकट से देखा है, अब तो वे कथा वाचक भी बन गए है, उनकी रचना ‘अपने-अपने राम’ ने अपार लोकप्रियता प्राप्त की है|
खैर मैं अब सीधे वर्तमान पर आता हूँ, श्री मुंतशिर ने फिल्म- ‘आदिपुरुष’ की पटकथा और गीत लिखे| इस फिल्म के लिए बहुत पहले जब झलक दिखाते हुए पोस्टर रिलीज़ किए गए थे, तब से ही विवाद शुरू हो गया था| फिल्म में भगवान श्रीराम और अन्य पात्रों को जिस रूप में दिखाया गया था, वह लोगों के मन में ‘रामायण’ और पारंपरिक रूप से देखे गए प्रभु के चित्रों से बिल्कुल अलग थे| खैर निर्माता ने कहा कि वे आवश्यक सुधार करेंगे और लंबे समय के बाद यह फिल्म संशोधनों के साथ रिलीज़ की गई|
अब रिलीज़ होने के बाद इसके कुछ संवादों को लेकर गंभीर आपत्तियाँ की जा रही हैं, मुझे लगता है कि निर्माता शायद चाहते थे कि इस प्रकार के कुछ विवाद बने रहें और शायद उससे फिल्म ज्यादा चल जाए, लेकिन यह दांव बिल्कुल उल्टा पड़ गया|
जनमानस की आस्थाओं से जुड़ी कथा अथवा प्रसंगों में इस प्रकार के एक्सपेरीमेंट स्वीकार्य नहीं हैं और इसके लिए निर्माता और इसके पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर को काफी बदनामी झेलनी पड़ी है, और उन्होंने शायद ऐसे संवाद फिल्म से निकाल भी दिए हैं, इस प्रकार मैं समझता हूँ कि यह विवाद समाप्त हो जाना चाहिए| लोगों की आस्था पर चोट करने का क्या परिणाम होता है ये शायद इस फिल्म से जुड़े लोगों की समझ में अच्छी तरह आ गया होगा|
मैं जिस मामले में बात करना चाहता हूँ वह फिल्मी दुनिया में ख्याति प्राप्त कर चुके श्री मनोज मुंतशिर पर हमले करने के मामले में है| हमला करने वालों में एक तो स्वयं को हिन्दू धर्म का रक्षक मानने वाले वे लोग हैं, जिन्होंने इस फिल्म की भाषा खराब होने की दुहाई देते हुए अपने वीडियो में जिस भाषा का प्रयोग किया है, वह उनके दूषित मस्तिष्क से भली भांति परिचित कराती है|
इस प्रतियोगिता में शामिल होने वाले वे लोग भी हैं जो काव्य लेखन में स्वयं को श्री मुंतशिर के समकक्ष या शायद उनसे बेहतर मानते हैं परंतु उनको कोई नहीं जानता| गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा भी है-
‘हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ’
आप बहुत अच्छा लिख सकते हैं, लेकिन किसको कितनी ख्याति मिलेगी, ये सब भाग्य के अनुसार ही होता है, या कहें कि ऊपर वाले के हाथ में होता है|
गोस्वामी तुलसीदास जी को भी अपने समय में बहुत विरोध का सामना करना पड़ा था, ये हम सब जानते हैं|
मेरे एक पत्रकार मित्र ने अपने लेख में इतना ही लिखा कि ‘इस फिल्म को लिखते समय मनोज मुंतशिर को क्या हो गया था!’ उन्होंने इस फिल्म के बहाने अपनी कुंठा को बाहर नहीं निकाला| इस फिल्म में मनोज मुंतशिर से गलती तो हुई है और ये गंभीर गलती है, लेकिन इस बहाने, कविता के क्षेत्र में उनसे पीछे रह गए लोगों को अपनी कुंठा निकालने का भी भरपूर मौका मिल गया|
मुझे श्रीरामचरित मानस का एक प्रसंग याद आ गया, जब प्रभु श्रीराम अपने साथियों की मानसिक परीक्षा लेते हैं| वे रात्रि में चांद को देखकर पूछते हैं- ये दाग कैसा है| इस प्रकार चांद के दाग के बहाने सब लोग अपनी मानसिक कुंठा और हीन भावना को व्यक्त करते हैं, कोई कहता है कि ये विष है, कोई कहता है कि किसी के रूप को सँवारने के लिए चांद का आधा भाग चुरा लिया गया था, कोई चांद को दुष्ट (सठ) भी कह देता है|
हनुमान जी बिना पूछे बताते हैं-
‘कहि मारुत सुत सुनहू प्रभु, ससि तुम्हार प्रिय दास,
तव मूरति विधु उर वसति, सोइ स्यामता आभास’
अर्थात जिसके मन में जो भरा है, वही बाहर निकलता है|
कुल मिलाकर यही बात है कि श्री मनोज मुंतशिर से गलती तो हुई लेकिन इस बहाने बहुत से लोगों को अपनी मानसिकता दर्शाने का मौका मिल गया|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to samaysakshi Cancel reply