आग का अपना-पराया क्या!

आज एक बार फिर से मैं, किसी समय अपनी कविताओं और गीतों से काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले प्रसिद्ध कवि और स्वर्गीय शिशुपालसिंह निर्धन जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ|

निर्धन जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपालसिंह निर्धन जी का यह गीत  –  

आग का अपना-पराया क्या ?
तुम जहां देखो लगी उसको बुझाओ
और घर की आग का सन्देश जाकर
हो सके तो आँधियों को मत सुनाओ
आग का अपना-पराया क्या ?

हो गया है पीढियों का रक्त पानी
शीर्षक से हट गई सारी कहानी
भृंग बनकर फूल पर मंडरा रहे हैं
वासना के उत्सवों मे गा रहे हैं
नियम-संयम के नगर मे लौटकर अब
दृष्टि पर तुम लाज का पहरा बिठाओ
आग का अपना-पराया क्या ?

ज़िन्दगी मिलती नहीं है दूध-धोई
त्याग की अब आग मे तपता न कोई
स्वार्थ का हर सांस पर पहरा हुआ है
न्याय डर से लोगों के बहरा हुआ है
ज्ञान का काजल लगाकर आँख में अब
आज घर की आग से घर को बचाओ
आग का अपना-पराया क्या?

राख बनकर रह न जाए घर हमारा
आग से बढकर हमे है डर तुम्हारा
देश का नैतिक पतन उत्थान पर है
सभ्यता इस देश की प्रस्थान पर है
आचरण बिलकुल अपावन हो चुके हैं
हो सके तो आदमी बनकर दिखाओ
आग का अपना – पराया क्या?

देश का धन लूटकर घर भर रहे हैं
किन्तु वे चर्चा पराई कर रहे हैं
आग है चारों तरफ पानी नहीं है
एक भी बादल यहाँ दानी नहीं है
तुम धरा की प्यास पर बरसो न बरसो
इस चमन पर बिजलियाँ तो मत गिराओ
आग का अपना-पराया क्या?

लेखनी कब से प्रभाती गा रही है
किन्तु तुमको नींद आती जा रही है
धूप को तुम सर चढाते जा रहे हो
भोर पर परदे गिराते जा रहे हो
देश के तुम हो, तुम्हारा देश है तो
झोंपड़ी से सूर्य का परिचय कराओ
आग का अपना – पराया क्या ?

साधना मे उम्र को खोया गया है
इन बिचारों को बहुत धोया गया है
हो गया है प्राण का जब दर्द- वंशी
तब ग़ज़ल और गीत को बोया गया है
देश के हित के लिए हम लिख रहे हैं
हो सके तो साज़ लेकर साथ गाओ
आग का अपना-पराया क्या?

फूल-कांटे साथ होते हैं चमन मे
किसलिए उत्पात का है ज्वार मन में
खो गए श्रृंगार में सब गाँव-गलियाँ
निरवसन होने चलीं हैं आज कलियाँ
सभ्यता सरिता किसी भी देश की हो
तुम न उसके घाट पर नंगे नहाओ
आग का अपना-पराया क्या?

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                            ********  

6 responses to “आग का अपना-पराया क्या!”

  1. बहुत सुंदर।

    Liked by 1 person

    1. हार्दिक धन्यवाद जी

      Like

  2. बेहतरीन रचना

    Liked by 1 person

    1. हार्दिक धन्यवाद जी

      Like

Leave a reply to samaysakshi Cancel reply