परदों के नाटक!

आज एक बार फिर से मैं, किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और अनूठी प्रस्तुति शैली से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ कवि जी का एक सुंदर गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ|

सरोज जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का यह गीत  –  

एक ओर परदों के नाटक एक ओर नंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

अव्वल मंच बनाया ऊँचा जनता नीची है
उस पर वर्ग-वर्ग में अंतर रेखा खींची है
समुचित नहीं प्रकाश-व्यवस्था अजब अँधेरा है
उस पर सूत्रधार को खलनायक ने घेरा है

पात्रों की सज्जा क्या कहिए, जैसे भिखमँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

नामकरण कुछ और खेल का, खेल रहे दूजा
प्रतिभा करती गई दिखाई लक्ष्मी की पूजा
अकुशल असंबद्ध निर्देशन-दृश्य सभी फीके
स्वयं कथानक कहता है, अब क्या होगा जी के

संवादों के स्वर विकलांगी कामी बेढँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

मध्यांतर पर मध्यांतर है कोई गीत नहीं
देश काल की सीमाओं को पाया जीत नहीं
रंगमंच के आदर्शों की यह कैसी दुविधा
उद्देश्यों के नाम न हो पाए कोई सुविधा

जन गण मन की जगह अंत में गाया हर गंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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One response to “परदों के नाटक!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    🧡

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