जीवन के पतझड़ में!

किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और अनूठी प्रस्तुति शैली से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय बलबीरसिंह ‘रंग’ जी का एक सुंदर गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ|

रंग जी  की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीरसिंह ‘रंग’ जी का यह गीत  –  

मेरे जीवन के पतझड़ में ऋतुपति
अब आए भी तो क्या ?
ऋतुराज स्वयं है पीत-वर्ण
मेरी आहों को छू-छू कर,
मेरे अंतर में चाहों की
है चिता धधकती धू-धू कर,

मेरे अतीत पर वर्तमान
अब यदि पछताए भी तो क्या ?

मधुमास न देखा जिस तस्र ने
फिर उसको ग्रीष्म जलाती क्यों ?
मधु-मिलन न जाना हो जिसने
विरहाग्नि उसे झुलसाती क्यों ?

अब कोई यदि मेरे पथ पर
दृग-सुमन बिछाए भी तो क्या ?

निर्झर ने चाहा बलि होना
सरिता की विगलित ममता पर,
हँस दी तब सरिता की लहरें
निर्झर की उस भावुकता पर,

यदि सरिता को उस निर्झर की
अब याद सताए भी तो क्या ?

जिसकी निश्छलता पर मेरे
अरमान निछावर होते थे,
जिसकी अलसाई पलकों पर
मेरे सुख-सपने सोते थे,
मेरे जीवन के पृष्ठ किसी
निष्ठुर की आँखों से ओझल,
शैशव की कारा में बंदी
मेरे नव-यौवन की हलचल,

दुख झँझानिल में भी मैंने
था अपना पथ निर्माण किया,
पथ के शूलों को भी मैंने
था फूलों-सा सम्मान किया,

प्यासों की प्यास बुझाना ही
निर्झर ने जाना जीवन भर,
सागर के खारे पानी में
घुल गया उधर सरिता का उर,

जिसके अपनाने में मैंने
अपनेपन की परवाह न की,
उसने मेरे अपनेपन का
क्रँदन सुनकर भी आह न की,
अब दुनिया मेरे गीतों में
अपनापन पाए भी तो क्या ?

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                            ********  

One response to “जीवन के पतझड़ में!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    💙

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