कब से तुम गा रहे!

आज मैं हिन्दी नवगीत के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ|

उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी की यह रचना  –  

कब से तुम गा रहे, कब से तुम गा रहे
कब से तुम गा रहे !

जाल धर आए हो नाव में
मछुओं के गाँव में
मेरी गली साँकरी की छाँव में
वंशी बजा रहे, कि
कब से तुम गा रहे
कब से हम गा रहे, कब से हम गा रहे
कब से हम गा रहे !

घनी-घनी पाँत है खजूर की
राह में हुजूर की
तानें खींच लाईं मुझे दूर की
वंशी नहीं दिल ही गला कर
तेरी गली में हम बहा रहे
कब से हम गा रहे !

सूनी तलैया की ओट में
डुबो दिया चोट ने
तीर लगे घायल कुरंग-सा
मन लगा लोटने
जामुन-सी काली इन भौंह की छाँह में
डूबे हम जा रहे,
कब से हम गा रहे !

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                            ********  

One response to “कब से तुम गा रहे!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    🧡

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