कभी ग़ुंचा कभी शोला!

कभी ग़ुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह,

लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह|

राना सहरी 

2 responses to “कभी ग़ुंचा कभी शोला!”

  1. वाह वाह।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी।

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