मैं समर्पित-बीज सा!

आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी गीत कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ|  उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र शुक्ल जी का यह नवगीत –

मैं वहीं हूँ जिस जगह पहले कभी था

लोग कोसों दूर आगे बढ़ गए हैं ।


ज़िन्दगी यह–एक लड़की साँवली-सी

पाँव में जिसने दिया है बांध पत्थर

दौड़ पाया मैं कहाँ उन की तरह ही

राजधानी से जुड़ी पगडंडियों पर


मैं समर्पित-बीज सा धरती गड़ा हूँ

लोग संसद के कंगूरे चढ़ गए हैं ।


तम्बुओं में बँट रहे रंगीन परचम

सत्य गूंगा हो गया है इस सदी में

धान पांकिल-खेत जिनको रोपना था

बढ़ गए वे हाथ धो बहती नदी में


मैं खुला डांगर, सुलभ सबके लिए हूँ

लोग अपनी व्यस्तता में मढ़ गए हैं ।


खो गई नदियाँ सभी अंधे कुएँ में

सिर्फ़ नंगे पेड़ हैं लू के झँवाए

ढिबरियों से टूटने वाला अंधेरा

गाँव भर की रोशनी पी, मुस्कराए


शाल-वन को पाट, जंगल बेहया के

आदतन मुझ पर तबर्रा पढ़ गए हैं ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                            ********  

2 responses to “मैं समर्पित-बीज सा!”

Leave a Reply