मेरी सदा के सामने!

रात इक उजड़े मकाँ पर जा के जब आवाज़ दी,

गूँज उट्ठे बाम-ओ-दर मेरी सदा के सामने|

मुनीर नियाज़ी

2 responses to “मेरी सदा के सामने!”

  1. खुबसूरत शेर

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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