स्मृतिकण!

आज मैं शायद पहली बार स्वर्गीय भगवतीचरण वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|  भगवतीचरण वर्मा जी अपने उपन्यासों के कारण अधिक प्रसिद्ध हुए थे, लेकिन वे अच्छे कवि भी थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भगवतीचरण वर्मा जी की यह कविता  

क्या जाग रही होगी तुम भी?
निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये! अपना यह व्यापक अंधकार,
मेरे सूने-से मानस में, बरबस भर देतीं बार-बार;
मेरी पीडाएँ एक-एक, हैं बदल रहीं करवटें विकल;
किस आशंका की विसुध आह! इन सपनों को कर गई पार

मैं बेचैनी में तडप रहा; क्या जाग रही होगी तुम भी?
अपने सुख-दुख से पीडित जग, निश्चिंत पडा है शयित-शांत,
मैं अपने सुख-दुख को तुममें, हूँ ढूँढ रहा विक्षिप्त-भ्रांत;
यदि एक साँस बन उड सकता, यदि हो सकता वैसा अदृश्य

यदि सुमुखि तुम्हारे सिरहाने, मैं आ सकता आकुल अशांत
पर नहीं, बँधा सीमाओं से, मैं सिसक रहा हूँ मौन विवश;
मैं पूछ रहा हूँ बस इतना- भर कर नयनों में सजल याद,
क्या जाग रही होगी तुम भी?

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                            ********  

2 responses to “स्मृतिकण!”

  1. Feliz domingo 🌈

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  2. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    💙

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