मोह!

स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ थे, मैंने प्रसाद जी, निराला जी और महादेवी जी की कुछ रचनाएं शेयर की हैं लेकिन पंत जी की रचनाएं उस तरह शेयर नहीं कर पाया हूँ| आज मैं उनकी एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह अत्यंत लोकप्रिय रचना  

छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया,
तोड़ प्रकृति से भी माया,
बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?

भूल अभी से इस जग को!
तज कर तरल-तरंगों को,
इन्द्र-धनुष के रंगों को,
तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा दूँ निज मृग-सा मन?

भूल अभी से इस जग को!
कोयल का वह कोमल-बोल,
मधुकर की वीणा अनमोल,
कह, तब तेरे ही प्रिय-स्वर से कैसे भर लूँ सजनि! श्रवन?

भूल अभी से इस जग को!
ऊषा-सस्मित किसलय-दल,
सुधा रश्मि से उतरा जल,
ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन?
भूल अभी से इस जग को!

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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One response to “मोह!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    💗

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