सुबह बने हैं ओस!

लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है हिन्दी के वरिष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय  कुमार शिव जी का एक नवगीत| कुमार शिव जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह नवगीत

सुबह बने हैं ओस
रात को बने सितारे
मेरे होंठों पर जितने
स्पर्श तुम्हारे ।

देहगन्ध जो आसपास
बिखरी है मेरे
कई तुम्हारे उसने
अद्भुत चित्र उकेरे
महक नीम के फ़ूलों की
मेरी साँसों में
इन्द्रधनुष बन लिपट गए
बाँहों के घेरे

जामुन जैसे कभी
कभी लगते हैं खारे
मेरे होंठों पर जितने
स्पर्श तुम्हारे ।

दाड़िम जैसे सुर्ख़
पके अँगूरों जैसे
किशमिश जैसे मधुर
लाल अमरूदों जैसे
है मिठास चीकू या
खट्टी नारंगी की
अवर्णनीय प्यासे
रेती के धोरों जैसे

मीठे हैं शहतूत
कभी जलते अँगारे
मेरे होंठों पर जितने
स्पर्श तुम्हारे ।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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2 responses to “सुबह बने हैं ओस!”

  1. बहुत ही खूबसूरत। धन्यवाद साझा करने के लिए।🙏

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी।

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