आज जिस गीत के बोल शेयर कर रहा हूँ, वह युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी प्रसिद्ध फिल्म- ‘हक़ीक़त’ से है और इसको चार श्रेष्ठ पुरुष गायकों- मोहम्मद रफ़ी साहब, मन्ना डे साहब, भूपेन्द्र जी और तलत महमूद जी ने बड़े खूबसूरत अन्दाज़ में गाया है| कैफ़ी आज़मी साहब का लिखा यह गीत, अपने बोलों, श्रेष्ठ अदायगी, मदन मोहन जी के लाजवाब संगीत और मोर्चे पर फौजी जवान बने कलाकारों द्वारा अदायगी के कारण एक धरोहर की तरह है|
लीजिए प्रस्तुत हैं फिल्म- ‘हक़ीक़त’ के इस यादगार गीत के बोल :

होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा,
ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा|
होके मजबूर मुझे …
दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे,
अश्क़ आँखों ने पिये और न बहाए होंगे,
बन्द कमरे में जो खत मेरे जलाए होंगे,
एक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा|
उसने घबराके नज़र लाख बचाई होगी,
दिल की लुटती हुई दुनिया नज़र आई होगी,
मेज से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी,
हर तरफ़ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा|
होके मजबूर मुझे …
छेड़ की बात पे अरमाँ मचल आए होंगे,
ग़म दिखावे की हँसी ने न छुपाए होंगे,
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आए होंगे,
सर न कांधे से सहेली के उठाया होगा|
ज़ुल्फ़ ज़िद करके किसी ने जो बनाई होगी,
और भी ग़म की घटा मुखड़े पे छाई होगी,
बिजली नज़रों ने कई दिन न गिराई होगी,
रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा|
होके मजबूर मुझे …
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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