युद्ध – 3

टैंक आगे बढे कि पीछे हटें,
कोख धरती की बांझ होती है !
फतह का जश्न हो कि हार का सोग,
जिंदगी मय्यतों पे रोती है !

साहिर लुधियानवी

2 responses to “युद्ध – 3”

  1. बिलकुल सही |

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks ji.

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