जगमग जगमग!

राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत कविताएं लिखने वाले, कविता की प्राचीन परंपरा के कवि स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मुझे याद है कि जब मैं छोटी कक्षाओं का ही विद्यार्थी था तब मैंने द्विवेदी जी की कुछ कविताएं पाठ्यक्रम में पढ़ी थीं | गांधी जी को लेकर लिखी गई उनकी प्रसिद्ध कविता ‘चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर‘ भी उनमें शामिल थी|

आज की कविता दीपकों को लेकर है जो गरीबों, अमीरों सभी की ज़िंदगी में उजाला करते हैं और हर स्थान को जगमगा देते हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की यह कविता-


हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,
नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,
कैसी उजियाली है पग-पग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

छज्जों में, छत में, आले में,
तुलसी के नन्हें थाले में,
यह कौन रहा है दृग को ठग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

पर्वत में, नदियों, नहरों में,
प्यारी प्यारी सी लहरों में,
तैरते दीप कैसे भग-भग!
जगमग जगमग जगमग जगमग!


राजा के घर, कंगले के घर,
हैं वही दीप सुंदर सुंदर!
दीवाली की श्री है पग-पग,
जगमग जगमग जगमग जगमग!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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2 responses to “जगमग जगमग!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      बहुत बहुत धन्यवाद जी।

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