ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

हरिवंश राय बच्चन जी हिन्दी की गीत परंपरा के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे| किसी समय कवि सम्मेलनों में उनके गीतों की धूम होती थी और लोग रात-रात भर जागकर उनके मधुर गीतों का आनंद लेते थे| उनकी प्रमुख विशेषता थी सरल भाषा में गहरी बात कहना|

लीजिए आज हरिवंश राय बच्चन जी के इस गीत का आनंद लीजिए-


सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!”

  1. Hi I am unable to like your posts.beautiful thought and expressions.

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks a lot ji.

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