हसरत मोहानी जी की एक ग़ज़ल के कुछ शेर आज शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल के कुछ शेर ग़ुलाम अली जी ने भी गाए थे| ग़ुलाम अली साहब की आवाज़ में इस ग़ज़ल का फिल्म- ‘निकाह’ में बड़ा खूबसूरत इस्तेमाल किया गया है|
लीजिए आज हसरत मोहानी जी की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है|
बा-हज़ाराँ इज़्तराब-ओ-सद हज़ाराँ इश्तियाक़,
तुझसे वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है|
तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा,
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है|
खेंच लेना वोह मेरा परदे का कोना दफ़अतन,
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है|
तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़,
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है|
ग़ैर की नज़रों से बच कर सबकी मरज़ी के ख़िलाफ़,
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है|
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे-फ़िराक़,
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है|
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए,
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है|
देखना मुझको जो बरगशता तो सौ-सौ नाज़ से,
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है|
चोरी-चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह,
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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