यार जुलाहे!

आज गुलज़ार साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ, गुलज़ार साहब की शायरी उनके अंदाज़ ए बयां के कारण अलग से पहचानी जाती है| आज की इस नज़्म में भी उन्होंने इंसानी रिश्तों में, प्रेम संबंधों में पड़ जाने वाली गांठों का बड़ी सहजता और प्रभावी ढंग से बयान किया है, जुलाहे की कलाकारी के बहाने से!

लीजिए आज गुलज़ार साहब की इस नज़्म का आनंद लीजिए-


मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे|
अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या ख़त्म हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो,
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ गिरह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई|


मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे
मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

2 responses to “यार जुलाहे!”

  1. बहुत सुन्दर

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      धन्यवाद जी।

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