गुलज़ार साहब हमारे देश के बहुत सृजनशील और प्रयोगधर्मी रचनाकार हैं| जहां फिल्मी दुनिया को उन्होंने बहुत से नायाब गीत दिए हैं वहीं जगजीत सिंह जी जैसे ग़ज़ल गायकों ने भी उनकी अनेक रचनाओं को अपना स्वर दिया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब की यह नज़्म-
मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं
गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
“तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है “
ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर
अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले,
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं,
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च
करने की तमन्ना है !!
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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