हिन्दी काव्य मंचों के प्रसिद्ध हास्य कवि स्वर्गीय ओमप्रकाश आदित्य जी एक अत्यंत सृजनशील रचनाकार थे, छंद पर उनका पूर्ण अधिकार था और उनकी हास्य कविताओं को बहुत आनंद और आदर के साथ सुना जाता था| मेरा सौभाग्य है कि अनेक बार कवि सम्मेलनों के आयोजन के कारण उनसे भेंट का अवसर मिला था|

आज प्रस्तुत है नेताजी का नख-शिख वर्णन करने वाली उनकी कविता, यह कविता काफी लंबी है, अतः इसको दो भागों में शेयर करूंगा, पहले भाग के रूप में, नेताजी के कुछ अंगों का वर्णन आज प्रस्तुत है-
सिर
बेपैंदी के लोटे-सा सिर शोभित
शीश-क्षितिज पर लघु-लघु कुंतल
सूखाग्रस्त क्षेत्र में जैसे
उजड़ी हुई फसल दिखती हो
धवल हिमालय-सा गर्वित सिर
अति उन्नत सिर
वोट मांगते समय स्वयं यों झुक जाता है
सिया-हरण से पूर्व झुका था जैसे रावण
या डसने से पूर्व सर्प जैसे झुकता है
स्वर्ण पट्टिका-सा ललाट है
कनपटियों तक
चंदन-चित्रित चौड़ा माथा
कनपटियों पर रेख उभरती कूटनीति की
माथे पर दुर्भाग्य देश का लिखा हुआ है
कान
सीपी जैसे कान शब्द जय-जय के मोती
कान नहीं ये षडयंत्रों के कुटिल भँवर हैं
एक कान ज्यों विरोधियों के लिए चक्रव्यूह
एक कान ज्यों चुगलखोर चमचे का कमरा!
नयन
रिश्वत के अंजन से अंजित
पर मद-रंजित
दूर किसी ऊँची कुर्सी पर
वर्षों से टकटकी लगाए
गिध्द नयन दो
भौहें हैं ज्यों मंत्री-मंडल की बैठक हो
पलकें ज्यों उद्धाटन मदिरा की दुकान का
अंतरंग कमरे-सी भीतर काली पुतली
पुतली में छोटा-सा गोलक जैसे कुर्सी
क्रोध-कुटिलता कपट कोरकों में बैठे हैं
शर्म न जाने इन ऑंखों में कहाँ छुप गई!
नाक
शहनाई-सी नाक, नफीरी जैसे नथुने
नाक नुकीली में ऊपर से है नकेल
पर नथ करती है
है नेता की नाक, नहीं है ऐरी-गैरी
कई बार कट चुकी किंतु फिर भी अकाट्य है!
मुख
होंठ कत्थई इन दोनों होठों का मिलना
कत्थे में डूबा हो जैसे चांद ईद का
चूने जैसे दाँत, जीभ ताम्बूल पत्र-सी
आश्वासन का जर्दा भाषण की सुपाड़ियाँ
नेताजी का मुख है अथवा पानदान है
अधरों पर मुस्कान सितारे जैसे टूटें
बत्तीसी दिखती बत्तीस मोमबत्ती-सी
बड़ा कठिन लोहे के चने चबाना लेकिन
कितने लोहे के पुल चबा लिए
इन दृढ़ दाँतों ने
निगल गई यह जीभ
न जाने कितनी सड़कें
लोल-कपोल गोल मुख-मंडल
मुख पर काला तिल कलंक-सा
चांद उतर आया धरती पर
नेता की सूरत में!
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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