लो,एक बजा दोपहर हुई!

हिन्दी मंचों पर गीतों के दिव्य हस्ताक्षर स्वर्गीय भारत भूषण जी, जो मेरठ, उत्तर प्रदेश से थे और उनके अनेक गीत मैं हमेशा गुनगुनाता रहा हूं, जैसे – चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखाड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’, मैं बनफूल, भला मेरा- कैसा खिलना, क्या मुरझाना’ आदि-आदि| मैं सभी गीतों के मुखड़े लिखूंगा तब भी यह आलेख पूरा हो जाएगा|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो गर्मी की दोपहर के कुछ दृश्य प्रस्तुत करता है, काफी प्रायोगिक किस्म का गीत है यह| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का ये गीत-



लो
एक बजा दोपहर हुई,
चुभ गई हृदय के बहुत पास
फिर हाथ घड़ी की
तेज सुई|

पिघली
सड़कें झरती लपटें
झुँझलाईं लूएँ धूल भरी,
किसने देखा किसने जाना
क्यों मन उमड़ा क्यों
आँख चुई|

रिक्शेवालों की
टोली में पत्ते कटते पुल के नीचे,
ले गई मुझे भी ऊब वहीं कुछ सिक्के मुट्ठी में भींचे,
मैंने भी एक दाँव खेला, इक्का माँगा पर
पर खुली दुई|

सहसा चिंतन को
चीर गई, आँगन में उगी हुई बेरी,
बह गई लहर के साथ लहर, कोई मेरी कोई तेरी।
फिर घर धुनिये की ताँत हुआ फिर प्राण हुए
असमर्थ रुई|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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2 responses to “लो,एक बजा दोपहर हुई!”

  1. नमस्ते सर

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Namaste ji.

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