मौसम नहीं, मन चाहिए !

एक बार फिर से आज हिन्दी काव्य मंचों पर गीत परंपरा के एक लोकप्रिय स्वर रहे, स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| इस गीत में यही संदेश दिया गया है कि अगर हमारे हौसले बुलंद हों, अगर हमारे मन में पक्का संकल्प हो तो हम कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक लोकप्रिय गीत-

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं,
हारे नहीं जब हौसले
तब कम हुये सब फासले,
दूरी कहीं कोई नहीं, केवल समर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

हर दर्द झूठा लग रहा, सहकर मजा आता नहीं,
आँसू वही आँखें वही
कुछ है ग़लत कुछ है सही,
जिसमें नया कुछ दिख सके, वह एक दर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

राहें पुरानी पड़ गईं, आख़िर मुसाफ़िर क्या करे !
सम्भोग से सन्यास तक
आवास से आकाश तक,
भटके हुये इन्सान को, कुछ और जीवन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कोई न हो जब साथ तो, एकान्त को आवाज़ दें !
इस पार क्या उस पार क्या !
पतवार क्या मँझधार क्या !!
हर प्यास को जो दे डुबा वह एक सावन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कैसे जियें कैसे मरें यह तो पुरानी बात है !
जो कर सकें आओ करें
बदनामियों से क्यों डरें,
जिसमें नियम-संयम न हो, वह प्यार का क्षण चाहिए!

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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4 responses to “मौसम नहीं, मन चाहिए !”

  1. Incredible! Loved it immensely.

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks a lot ji.

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  2. Awesome! I loved it so much ❤️

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks Anjali ji.

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