तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे!

आज ज़नाब नज़ीर बाक़री जी की लिखी हुई एक गज़ल याद आ रही है, जिसे जगजीत सिंह जी ने अपनी मधुर आवाज में गाकर अमर कर दिया।

 

 

इस गज़ल को सुनते हुए यही खयाल आता है कि कैसे अजीब प्राणी होते हैं ये कवि-शायर भी, ज़ुर्म भी क़ुबूल करेंगे और सज़ा भी अपनी पसंद की पाना चाहेंगे। जैसे ये ज़नाब आंखों के समुंदर में डूबकर मरने की सज़ा पाना चाहते हैं।

कुछ शेर इस गज़ल में बहुत अच्छे बन पड़े हैं और यह भी जगजीत सिंह जी की गाई कुछ लोकप्रिय गज़लों में शामिल है। आइए इस गज़ल को फिर से याद करते हैं-

 

अपनी आँखों के समंदर मैं उतर जाने दे,
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे|

 

ऐ नये दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना,
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे|

 

आग दुनिया की लगाई हुई बूझ जाएगी,
कोई आँसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे।

 

ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको,
सोचता हूँ कि कहू तुझसे, मगर जाने दे।

 

ज़िंदगी मैंने इसे कैसे पिरोया था न सोच,
हार टूटा है तो मोती भी बिखर जाने दे।

 

इन अंधेरों से ही सूरज कभी निकलेगा ‘नज़ीर’,
रात के साये जरा और निखर जाने दे।

 

अपनी आँखों के समंदर मैं उतर जाने दे,
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे।

 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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2 responses to “तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे!”

  1. बहुत सुंदर

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    1. Thanks a lot.

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