मैं पानी की कलाई हूँ!

कविता के क्षेत्र में जो लोग मेरे लिए गुरुतुल्य रहे हैं, उनमें से एक हैं डॉ. कुंवर बेचैन जी। मैं एक छात्र के रूप में कुछ समय के लिए गाजियाबाद के एम.एम.एच. कालेज भी गया था, मैं तो विज्ञान का छात्र था, उस समय भी डॉ. कुंवर बेचैन जी उसी कालेज में पढ़ाते थे। उनकी क्लास ऐसी लोकप्रिय होती थी कि अन्य विषय के छात्र भी उनकी कक्षा में आकर बैठ जाते थे, क्योंकि वे साहित्य पढ़ाते समय समझाने के लिए अपनी कविताएं सुनाते थे।

डॉ. बेचैन जी से मेरी शुरू में कविता में रुचि लेने वाले एक श्रोता के रूप में कवि सम्मेलनों में, फिर एक जूनियर कवि के रूप में कवि गोष्ठियों में और बाद में एक आयोजक के रूप में भी मुलाक़ात हुई, क्योंकि अपने संस्थान एनटीपीसी में कवि सम्मेलन और अन्य आयोजन कराने का सुअवसर भी मुझे मिलता था।

मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में अन्य लोगों के साथ-साथ डॉ. बेचैन जी का उल्लेख भी किया है और उनके गीत अनेक बार उद्धृत किए हैं।

एक गीत जो मुझे पहले से ही बहुत प्रिय है, उसको हाल ही में डॉ. बेचैन जी ने डॉ. कुमार विश्वास द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले एक कार्यक्रम में पढ़ा और पुनः उस गीत के सौंदर्य पर ध्यान गया। इस कार्यक्रम में डॉ. कुमार विश्वास ने भी यह बताया कि डॉ. बेचैन उनके भी गुरुजनों में रहे हैं।
मैं डॉ. बेचैन जी का यह खूबसूरत गीत इस शुभकामना के साथ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि वे लंबे समय तक हमें मधुर गीतों की सौगात देते रहें। प्रस्तुत है डॉ. कुंवर बेचैन जी का लिखा ये सुंदर गीत-

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ।
मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।।

मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया;
लहर होते हुए भी तो मेरा मन न लहराया;
मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया।
बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर;
छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।।

मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका;
कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका;
मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका।
मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई;
मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।।

पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल;
नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल;
नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल।
पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।

आज इस मधुर गीत के साथ ही मैं इस महान रचनाकार का स्मरण करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनको लंबी उम्र दें और वे इसी प्रकार हमें मधुर गीतों की सौगात देते रहें।

नमस्कार।
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3 responses to “मैं पानी की कलाई हूँ!”

  1. Beautiful and melodious.

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