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बिक गए जब तेरे लब!
बिक गए जब तेरे लब फिर तुझ को क्या शिकवा अगर,ज़िंदगानी बादा ओ साग़र से बहलाई गई| साहिर लुधियानवी
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दिन तेरे सोगवारों के!
शुग़्ल-ए-मय-परस्ती गो जश्न-ए-ना-मुरादी था,यूँ भी कट गए कुछ दिन तेरे सोगवारों के| साहिर लुधियानवी
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पैरहन घटाओं के!
तुम ने सिर्फ़ चाहा है हम ने छू के देखे हैं,पैरहन घटाओं के जिस्म बर्क़-पारों के| साहिर लुधियानवी
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कठोर दयालुता- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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अजनबी दयारों के!
पहले हँस के मिलते हैं फिर नज़र चुराते हैं, आश्ना-सिफ़त हैं लोग अजनबी दयारों के| साहिर लुधियानवी
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गेसुओं की छाँव में!
गेसुओं की छाँव में दिल-नवाज़ चेहरे हैं,या हसीं धुँदलकों में फूल हैं बहारों के| साहिर लुधियानवी
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हम से पूछकर देखो!
ख़ल्वतों* के शैदाई ख़ल्वतों में खुलते हैं,हम से पूछ कर देखो राज़ पर्दा-दारों के|*एकांत साहिर लुधियानवी
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सुनो हवाओ अगर!
बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना,सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मुझे तू ढाल दे ऐसे!
मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में,मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो’तबर हो जाऊँ| मुनव्वर राना