-
इस तरह सोए हैं!
इस तरह सोए हैं सर रख के मिरे ज़ानू पर,अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
-
बेवफ़ा लिखते हैं वो!
बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को,ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
-
लाख करूँगा सज्दे!
नक़्श-ए-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सज्दे,सर मिरा अर्श नहीं है जो झुका भी न सकूँ| अमीर मीनाई
-
कि उसे हाल सुनाऊँ!
ज़ब्त कम-बख़्त ने याँ आ के गला घोंटा है,कि उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ| अमीर मीनाई
-
डाल के ख़ाक मेरे!
डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा,कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
-
उस की हसरत है !
उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ,ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ| अमीर मीनाई
-
फाँसियाँ उगती रहीं!
फाँसियाँ उगती रहीं ज़िंदाँ उभरते ही रहे,चंद दीवाने जुनूँ के ज़मज़मे गाते रहे| अली सरदार जाफ़री
-
कामायनी/चिंता-1
एक बार फिर से आज मैं छायावाद युग से एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी के चिंता सर्ग के प्रथम भाग का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ। प्रसाद जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी का…
-
आरिज़ पे लहराते रहे!
जिस क़दर बढ़ता गया ज़ालिम हवाओं का ख़रोश,उस के काकुल और भी आरिज़ पे लहराते रहे| अली सरदार जाफ़री
-
रहबरों की भूल थी!
रहबरों की भूल थी या रहबरी का मुद्दआ’,क़ाफ़िलों को मंज़िलों के पास भटकाते रहे| अली सरदार जाफ़री