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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Jun 2025

    इस तरह सोए हैं!

    इस तरह सोए हैं सर रख के मिरे ज़ानू पर,अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूँ| अमीर मीनाई

  • 25th Jun 2025

    बेवफ़ा लिखते हैं वो!

    बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को,ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ| अमीर मीनाई

  • 25th Jun 2025

    लाख करूँगा सज्दे!

    नक़्श-ए-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सज्दे,सर मिरा अर्श नहीं है जो झुका भी न सकूँ| अमीर मीनाई

  • 25th Jun 2025

    कि उसे हाल सुनाऊँ!

    ज़ब्त कम-बख़्त ने याँ आ के गला घोंटा है,कि उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ| अमीर मीनाई

  • 25th Jun 2025

    डाल के ख़ाक मेरे!

    डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा,कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ| अमीर मीनाई

  • 25th Jun 2025

    उस की हसरत है !

    उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ,ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ| अमीर मीनाई

  • 25th Jun 2025

    फाँसियाँ उगती रहीं!

    फाँसियाँ उगती रहीं ज़िंदाँ उभरते ही रहे,चंद दीवाने जुनूँ के ज़मज़मे गाते रहे| अली सरदार जाफ़री

  • 25th Jun 2025

    कामायनी/चिंता-1

    एक बार फिर से आज मैं छायावाद युग से एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी के चिंता सर्ग के प्रथम भाग का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ। प्रसाद जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी का…

  • 24th Jun 2025

    आरिज़ पे लहराते रहे!

    जिस क़दर बढ़ता गया ज़ालिम हवाओं का ख़रोश,उस के काकुल और भी आरिज़ पे लहराते रहे| अली सरदार जाफ़री

  • 24th Jun 2025

    रहबरों की भूल थी!

    रहबरों की भूल थी या रहबरी का मुद्दआ’,क़ाफ़िलों को मंज़िलों के पास भटकाते रहे| अली सरदार जाफ़री

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