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आँखों में डोरे गुलाबी!
हैं यूँ मस्त आँखों में डोरे गुलाबी, शराबी के पहलू में जैसे शराबी| नज़ीर बनारसी
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हुजूम-ए-ख़्वाब लिए!
अजब नहीं कहीं ताबीर कोई मिल जाए, भटक रहा हूँ गिरह में हुजूम-ए-ख़्वाब लिए| नज़ीर क़ैसर
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हवाएँ फिरती हैं!
हवाएँ फिरती हैं रस्तों में बाल खोले हुए, ये रात सर पे खड़ी है कोई अज़ाब लिए| नज़ीर क़ैसर
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जाड़े की धूप!
एक बार फिर से आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सर्वेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता– बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया ताते जल नहा पहन श्वेत वसन…
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कि मैं तो ख़ुशबू था!
बिखर के जाता कहाँ तक कि मैं तो ख़ुशबू था,हवा चली थी मुझे अपने हम-रिकाब लिए| नज़ीर क़ैसर
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तू ढूँडने मुझे निकला !
मैं एक ढलता सा साया ज़मीं के क़दमों में,तू ढूँडने मुझे निकला है आफ़्ताब लिए| नज़ीर क़ैसर