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शबाब आया है!
शबाब आया है पैदा रंग है रुख़्सार-ए-नाज़ुक से,फ़रोग़-ए-हुस्न कहता है सहर होती है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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शराब-ए-हुस्न को !
शराब-ए-हुस्न को कुछ और ही तासीर देता है,जवानी के नुमू से बे-ख़बर होना लड़कपन में| चकबस्त बृज नारायण
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शहीद-ए-यास हूँ!
शहीद-ए-यास हूँ रुस्वा हूँ नाकामी के हाथों से,जिगर का चाक बढ़ कर आ गया है मेरे दामन में| चकबस्त बृज नारायण
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जीवन क्रम : तीन चित्र!
एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नंदन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की यह कविता– रेशमी कंगूरों परनर्म धूप सोयी।मौसम नेनस-नस मेंनागफनी बोयी!दोषों के खाते में…
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तरसते अब हैं पानी!
जिन्हें सींचा था ख़ून-ए-दिल से अगले बाग़बानों ने,तरसते अब हैं पानी को वो पौदे मेरे गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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असीरी लाज़मी है!
यहाँ तस्बीह का हल्क़ा वहाँ ज़ुन्नार का फंदा,असीरी लाज़मी है मज़हब-ए-शैख़-ओ-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण
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सैकड़ों मोती हैं!
ज़माने में नहीं अहल-ए-हुनर का क़द्र-दाँ बाक़ी,नहीं तो सैकड़ों मोती हैं इस दरिया के दामन में| चकबस्त बृज नारायण
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बहार आई है!
हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-बख़ुद बेचैन करती है,क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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तिरी क़ुदरत से वो!
गराँ थी धूप और शबनम भी जिन पौदों को गुलशन में,तिरी क़ुदरत से वो फूले-फले सहरा के दामन में| चकबस्त बृज नारायण
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शजर सकते में हैं!
शजर सकते में हैं ख़ामोश हैं बुलबुल नशेमन में,सिधारा क़ाफ़िला फूलों का सन्नाटा है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण