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कितना बडा अचंभा!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- जीवन कितना बडा अचंभाछोटे पांव, रास्ता लंबा। कितनी बार अश्रु छलकाएबरबस हर्षाए, बौराएलेकिन यह भी सच है भाई काफी दूर चले हम आए, राह दिखाता श्वान कहीं परऔर कहीं बिजली का खंबा। काम किया, आराम किया हैजब चाहा संग्राम किया हैकभी खुश किया…
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ये ज़मीं चाँद से बेहतर!
गर्दिश-ए-वक़्त का कितना बड़ा एहसाँ है कि आज, ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें| शहरयार
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फिर कहीं ख़्वाब ओ!
फिर कहीं ख़्वाब ओ हक़ीक़त का तसादुम होगा,फिर कोई मंज़िल-ए-बे-नाम बुलाती है हमें| शहरयार
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ज़िंदगी देखिए क्या!
तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें,ज़िंदगी देखिए क्या रंग दिखाती है हमें| शहरयार
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यू ट्यूब पर मेरा एक और गीत
आप यू ट्यूब पर मुझसे जुडेंगे तो अच्छा लगेगा।यू ट्यूब पर मैं अभी अपनी कविताएं शेयर कर रहा हूँ, बाद में मुकेश जी के और अन्य गायकों के गाए गीत भी प्रस्तुत करूंगा। नमस्कार ******
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तीन रंग का धन्धा!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। मालवीय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – एक कमल का रोगीएक कुष्ट का रोगीइक सावन का अन्धायही त्रिवेणी राष्ट्र पताकातीन रंग का धन्धा…