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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Sep 2025

    कितना बडा अचंभा!

    आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- जीवन कितना बडा अचंभाछोटे पांव, रास्ता लंबा। कितनी बार अश्रु छलकाएबरबस हर्षाए, बौराएलेकिन यह भी सच है भाई काफी दूर चले हम आए, राह दिखाता श्वान कहीं परऔर कहीं बिजली का खंबा। काम किया, आराम किया हैजब चाहा संग्राम किया हैकभी खुश किया…

  • 22nd Sep 2025

    हम लोग ज़रा देर से!

    उम्मीद से कम चश्म-ए-ख़रीदार में आए, हम लोग ज़रा देर से बाज़ार में आए| शहरयार

  • 22nd Sep 2025

    ये ज़मीं चाँद से बेहतर!

    गर्दिश-ए-वक़्त का कितना बड़ा एहसाँ है कि आज, ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें| शहरयार

  • 22nd Sep 2025

    फिर कहीं ख़्वाब ओ!

    फिर कहीं ख़्वाब ओ हक़ीक़त का तसादुम होगा,फिर कोई मंज़िल-ए-बे-नाम बुलाती है हमें| शहरयार

  • 22nd Sep 2025

    ज़िंदगी देखिए क्या!

    तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें,ज़िंदगी देखिए क्या रंग दिखाती है हमें| शहरयार

  • 22nd Sep 2025

    यू ट्यूब पर मेरा एक और गीत

    आप यू ट्यूब पर मुझसे जुडेंगे तो अच्छा लगेगा।यू ट्यूब पर मैं अभी अपनी कविताएं शेयर कर रहा हूँ, बाद में मुकेश जी के और अन्य गायकों के गाए गीत भी प्रस्तुत करूंगा। नमस्कार ******

  • 22nd Sep 2025

    अब किसी की ज़बाँ!

    अब किसी की ज़बाँ नहीं खुलती,रस्म जारी है मुँह-भराई की| राहत इंदौरी

  • 22nd Sep 2025

    तीन रंग का धन्धा!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। मालवीय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – एक कमल का रोगीएक कुष्ट का रोगीइक सावन का अन्धायही त्रिवेणी राष्ट्र पताकातीन रंग का धन्धा…

  • 21st Sep 2025

    इश्क़ के कारोबार में!

    इश्क़ के कारोबार में हम ने,जान दे कर बड़ी कमाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Sep 2025

    क्या भलाई की!

    ज़िंदगी जैसे-तैसे काटनी है,क्या भलाई की क्या बुराई की| राहत इंदौरी

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