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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 30th May 2017

    16. घर, शहर, दीवार, सन्नाटा- सबने हमें बांटा

    जिस प्रकार लगभग सभी के जीवन में भौतिक और आत्मिक स्तर पर घटनाएं होती हैं, जिनको शेयर करना समीचीन होता है। मैं प्रयास करूंगा कि जहाँ तक मेरी क्षमता है, मैं रुचिकर ढंग से इन  घटनाओं को आपके सपने रखूं। इस क्रम में अनेक नगर, व्यक्ति और उल्लेखनीय घटनाएं शामिल होंगी, लेकिन मेरा ऐसा इरादा…

  • 28th May 2017

    15. नक्काशी करते हैं नंगे जज़्बातों पर

                      दिल्ली में उन दिनों तीन-चार ही ठिकाने होते थे मेरे, जिनमें से बेशक उद्योग भवन स्थित मेरा दफ्तर एक है, उसके अलावा शाम के समय दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी या फिर कनॉट प्लेस, जहाँ अनेक साहित्यिक मित्रों से मुलाक़ात होती थी। इसके अलावा जब बुलावा आ जाए तब आकाशवाणी में युववाणी केंद्र, जिसका कार्य…

  • 27th May 2017

    14. एक बूढ़ा आदमी है देश में या यूं कहें इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।

    जीवन में कोई कालखंड ऐसा होता है, कि उसमें से किस घटना को पहले संजो लें, समझ में नहीं आता है। अब उस समय को याद कर लेते हैं जब सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और नाइंसाफी के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण जी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन चलाया हुआ था। इस आंदोलन ने पूरे देश को झकझोर…

  • 26th May 2017

    13. मंज़िल न दे, चराग न दे, हौसला तो दे

    एक नाइंसाफी तो लंबे समय से चलती चली आई है कि इतिहास को राजाओं के शासन काल से बांट दिया गया, बल्कि इतिहास का मतलब सिर्फ इतना हो गया कि किस राजा ने किस समय तक शासन किया, कहाँ जीत-हार हासिल की, कौन से अच्छे-बुरे काम किए। मैंने भी यहाँ अपनी नौकरियों की अवधि के…

  • 25th May 2017

    12. सफर दरवेश है ऐ ज़िंदगी….

    दिल्ली में रहते हुए मैंने पीताम्बर बुक डिपो और दिल्ली प्रेस में दो प्राइवेट नौकरी की थीं और उसके बाद 6 वर्ष  तक उद्योग मंत्रालय में कार्य किया, जिसमें से मैं 3 वर्ष तक संसदीय राजभाषा समिति में डेपुटेशन पर भी रहा। खैर फिलहाल तो दिल्ली प्रेस की ही बात चल रही है। कुछ साहित्यिक…

  • 24th May 2017

    11. हम शंटिंग ट्रेन हो गए

    पीताम्बर बुक डिपो में कुल मिलाकर मैं एक साल तक रहा, उसके बाद मैंने फैसला कर लिया कि अब यहाँ अधिक समय तक नहीं रहूंगा। अब तक इतना आत्मविश्वास आ गया था कि मैं इससे बेहतर काम खोज सकता हूँ। और हुआ भी ऐसा, यह काम छोड़ने के बाद एक महीने के अंदर ही दिल्ली…

  • 23rd May 2017

    10. रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें

     ऐसा हुआ कि आगे पढ़ाई जारी रखने की तो गुंजाइश नहीं बची थी और तुरंत कोई काम तलाशने की भी ज़रूरत थी। उन दिनों हमारे पड़ौस में ही एक सज्जन रहते थे, जो व्यवसायी थे और उनके कुछ संपर्क थे, सो उन्होंने एक संदर्भ दिया और उनकी सलाह पर मैंने चांदनी चौक में जाकर संपर्क…

  • 22nd May 2017

    9. झूमती चली हवा

    लगातार सीधी राह पर चलते जाने से भी काफी थकान हो जाती है, अतः थोड़ा इधर-उधर टहल लेते हैं। मैं यह भी बता दूं कि यहाँ अपनी निजी ज़िंदगी का विवरण देना मेरा उद्देश्य नहीं है। पात्र यदि कहीं आए हैं तो वे या तो पृष्ठभूमि के तौर पर आए हैं, या ऐसे पात्र आए…

  • 22nd May 2017

    8. कालेज के दिन

      जैसी बात हुई थी, अब बारी है कालेज के दिनों के बारे में बात करने की। बाबूराम स्कूल में 6 साल रहा और अच्छा खासा जुड़ाव रहा स्कूल से, इसलिए स्कूल के बारे में, वहाँ के शिक्षकों के बारे में भी मैंने कुछ बात की। यहाँ स्पष्ट कह दूं कि कालेज से मेरा कोई…

  • 21st May 2017

    7. बाबूराम स्कूल

    अब स्कूल के बारे में बात कर लें। कक्षा 1 से 5 तक गौशाला वाले सनातन धर्म स्कूल के बारे में तो बताने को कुछ नहीं है। बाबूराम स्कूल के बारे में ही बात करूंगा जहाँ मेंने कक्षा 6 से 11 तक की पढ़ाई की थी। कुछ चित्र जो मस्तिष्क में आते हैं, वे धीरे-धीरे…

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