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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Jul 2017

    47. छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन 

    हाल में हुई एक घटना पर टिप्पणी करने का मन हो रहा है। इस घटना के पात्र हैं सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन और आज के लोकप्रिय कवि डॉ. कुमार विश्वास । घटना के बारे में चर्चा करने से पहले, इन दोनों पात्रों के बारे में कुछ बात कर लेते हैं। श्री अमिताभ बच्चन…

  • 26th Jul 2017

    46. हर-एक कदम पे तलाशा किया रक़ीब नए,  मेरा खयाल है आईने पर गया हूँ मैं। 

    काफी लंबा अंतराल हो गया इस बार। इस बीच 3 जुलाई को हम गुड़गांव छोड़कर गोआ में आ बसे। यह हमारा नया ठिकाना है और मुझे अभी तक भ्रम रहता है कि ‘गोआ’  लिखूं या ‘गोवा’। खैर, यह बता दूं कि गुड़गांव छोड़ने से पहले मेरे लैपटॉप ने हल्का सा स्नान कर लिया था, चुल्लू…

  • 29th Jun 2017

    45. हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ

    हाँ तो कहाँ जाना है- गोआ! जो एक पर्यटक के रूप में वहाँ गए हैं, उनके मन में एक छवि होगी गोआ की, लेकिन वहाँ रहने वाले के लिए तो गोआ कुल मिलाकर, वही नहीं होता, जो किसी पर्यटक के लिए होता है! हालांकि जब मैं एक वर्ष तक मुंबई रहा, उस दौरान मेरे लिए…

  • 28th Jun 2017

    44. बंद दरवाजे ज़रा से खोलिये रोशनी के साथ हंसिए बोलिये

    संक्रमण काल है, सामान जा चुका, अब अपने जाने की बारी है। ऐसे में भी मौका मिलने पर बात तो की जा सकती है। समय है गुड़गांव से गोआ शिफ्ट होने का, गुड़गांव के साथ 7 वर्ष तक पहचान जुड़ी रही, अब गोआ अपना ठिकाना होगा। आज मन हो रहा है कि एक बार फिर…

  • 25th Jun 2017

    43. रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना

    मैंने पिछले 42 दिनों में, अपने बचपन से लेकर वर्ष 2010 तक, जबकि मेरे सेवाकाल का समापन एनटीपीसी ऊंचाहार में हुआ, तब तक अपने आसपास घटित घटनाओं को साक्षी भाव से देखने का प्रयास किया, जैसे चचा गालिब ने कहा था- बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीदार नहीं हूँ। मैंने ज़िक्र किया था कि एक बार…

  • 24th Jun 2017

    42. इस धरती से उस अम्बर तक,दो ही चीज़ गज़ब की हैं, एक तो तेरा भोलापन है,एक मेरा दीवानापन।

    मैंने लखनऊ प्रवास का ज्यादा लंबा ज़िक्र नहीं किया और ऊंचाहार के सात वर्षों को तो लगभग छोड़ ही दिया, क्योंकि मुझे लगा कि जो कुछ वहाँ हुआ, वह पहले भी हो चुका था। राजनीति की कोई कितनी बात करेगा! ऊंचाहार में भी मुझे भरपूर प्यार मिला, कवि सम्मेलनों के आयोजन, पहले की तरह नियमित…

  • 23rd Jun 2017

    41. मधु का सागर लहराता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका!

    मैंने कितनी नौकरियों और अलग-अलग स्थानों पर तैनाती के बहाने से अपनी राम-कहानी कही है, याद नहीं। लेकिन आज दो नौकरियों की याद आ रही है, जिनका ज़िक्र नहीं हुआ। जाहिर है ये काम मैंने शुरू के समय में, बेरोज़गार रहते हुए, शाहदरा में निवास के समय ही किए थे। एक नौकरी थी फिल्म देखने…

  • 22nd Jun 2017

    40. चर्बी वारो बटर मिलैगो, फ्रिज में हे बनवारी!

    पता नहीं क्या सोचकर यह ब्लॉग लिखने की शुरुआत की थी। और इसको शेयर करता हूँ ट्विटर पर, फेसबुक पर! जैसे गब्बर सिंह ने सवाल पूछा था, क्या सोचा था सरदार बहुत खुश होगा, शाबाशी देगा! यहाँ पर सरदार कौन है! यह बहस तो शुरू से चली आ रही है कि कुछ भी लिखने से…

  • 21st Jun 2017

    39. उनके पर्चम भले ही किलों पर रहे, पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही।

    लगभग ढाई वर्ष के लखनऊ प्रवास और सात वर्ष के ऊंचाहार प्रवास की कुछ छिटपुट घटनाएं याद करने का प्रयास करता हूँ। अब घटनाओं की या व्यक्तियों की उस प्रकार विस्तार में बात नहीं करूंगा, समझिए कि कहानी सुनाने का सिलसिला समाप्त हुआ। एक घटना जो याद आ रही है, वह है लखनऊ के पिकप…

  • 20th Jun 2017

    38. यह पूजन अपनी संस्कृति का, ये अर्चन अपनी भाषा का।

    अभी तक मैं वर्षों के हिसाब से बात कर रहा था, जो घटना पहली हुई वह पहले और जो बाद में हुई वह बाद में। पिछले ब्लॉग में, मैं काफी पीछे चला गया था। वैसे मैंने लखनऊ पहुंचने तक की बात की थी, जिसके बाद लगभग 10 वर्ष की सेवा एनटीपीसी में रही। समय क्रम…

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